जाहिर है।

कभी-कभी यूँही कुछ शब्द कब रचना बन जाते है पता ही नहीं लगता आज ही थोड़ा सा अनकहा महसूस हो रहा था तो पाएलो कायलो की जाहिर पढ़ने बैठ गया तो कब कुछ लाइन्स निकल गयी पता ही नहीं चला- 👇

ये खिलखिलाती धूप, चढ़ता हुआ दिन,
ये सुगबुगाहट लिए पशु-पक्षी,
शहर का शोर-शराबा,
ना समझ आने वाले लोग,

इसी के बीच एक उदास, बैचैन मन,
भरी हुई आँखें, मुरझाया हुआ चेहरा,
सब तो जाहिर है,

फिर ये अजीब शख्सियत कौन है?
क्या मैं?
नहीं मैं तो ऐसा नहीं हूं, जाहिर है!

शायद तेरा ना होना अखर रहा है,
या तेरे होने का अहसास? जाहिर है!

कभी सीधा चलना, तो कभी बैठ जाना
कोई तो इबादत में है मेरे लिए,
क्या मेरे पक्ष में इबादत? जाहिर है!

दायाँ दाएँ चला तो बायां बाएं जाएगा जाहिर है!
सामने दीवार लिए चेहरा बढ़ा क्यों? जाहिर है!

✍.........                     ............जाहिर है!

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