क्या कहूँ! कुछ कहानियां रह गई है शायद, फर्क कुछ नहीं है अब मेरा होना मजबूरियाँ रह गई है शायद..
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वंशावली
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विगत वर्ष मैंने प्रयास किया कि हमारी वंशावली बनाई जाय। जिससे कि ग्रामीण परिवेश में भूले जा चुके रिश्ते पुनर्जीवित हो सकें और इसके लिए बड़े भाई साहब की बनाई हुई वंशावली पर संशोधन करना था। मैंने विचार किया कि इसमें हमारी चेली-बेटियों का नाम भी सम्मलित किया जाना चाहिए ताकि हमारी भावी पीढ़ियाँ खून के रिश्ते को समझ सकें और फिर वैवाहिक सम्बन्धों में दूरी बना सके। दरअसल ऐसा करने के पीछे कारण था कि हमारे बगल में एक गाँव है जहाँ बहुत पुराने समय से इंटर कॉलेज है और पड़ोस उसके अड़ोस-पड़ोस के गाँव के बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं। ऐसे ही किसी कक्षा में पढ़ने वाले दो बच्चे मिलते हैं और प्रेम हो जाता है। उनके परिवारों का आपस में कोई रिश्ता न था तो प्रेम परवान चढ़ा और फिर लड़का सेना में भर्ती हो गया। तब इसने छुट्टी में आकर जैसा कि हमारे यहाँ प्रचलित है भगाकर विवाह कर लिया जो कि सामाजिक वैद्यता के साथ होता ही है। शादी हुई तो मालूम पड़ा कि उन दोनों की माताएं तो सगी ममेरी-फुफेरी बहनें हैं। अब क्या होता जब चिड़ियां चुग गई।खेत। दरअसल हमारी पड़ोस की एक दीदी का विवाह 1 गाँव छोड़कर तीसरे गाँव में हुआ था और उसकी मामा की बेटी ...
सुबह-सुबह
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जेहनी सुकूँ मिले, चलो छेड़ो ऐसे राग को, ये नया कारोबार है, जरा यूँ सम्भालो, जैसे सुहागन सुहाग को, अरे रुको! हरियाली है बहुत, दुरस्त रखो दिमाग को, ये नई पौध है, यूँ न बिगाड़ो, जैसे दूब उजाड़ती है बाग को। सुंदर बगिया बनाई है पूर्वसूरियों ने पर, जमाने की सोची थी तोड़ दी देखो, पुष्पराज ने नई कपोलों की धाग को।
सोचता हूँ...
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कई रोज से लिख नहीं पाया, याद रोज की है- आज बस में हूँ, वैसे ही जैसे आपने जिक्र किया था सफर लम्बा है, बगल में अभी किशोर युवा लड़का है, जोकि स्पीकर में प्रेमिका से बतिया रहा है और चैट में किसी और से उसे मेरे या बस में किसी के होने से फर्क नहीं पड़ता। हाँ मैं कई रोज से सोच रहा हूँ जो उसमें आता हूँ. सोचता हूँ, रात के अंधेरे मेंज़ चमकती गाड़ियों की हेडलाइटें क्या बयां कर रही होती है... फिर सोचता हूँ, सुबह-सबेरे, नहा-धोकर, माथे में तुम्हारे छोटी सी लाल बिंदी जँचती तो होगी न फिर सोचता हूँ किसी रोज बड़ी सी बिंदिया तुम्हारे चेहरे को चार चाँद लगा देती होगी... फिर लिखूंगा... सप्रेम💐
खग ही जाने खग की भाषा
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खग ही जाने खग की भाषा प्रेम करने वाला ही जाने प्रेम क्या है मुझे तुमसे या तुमसे पहले भी कइयों से जुड़ाव रहा लगाव रहा तुम्हारे बाद भी है और ऐसा नहीं कि आकर्षण होना बंद हो गया है। मार्ग है यह होता ही है। हाँ पर अब बचपना नहीं है, खुद तक सीमित है और सबसे जरूरी क़ि तुम एक मानक रेखा सी हो पीछे एक रबड़ से पेंसिल जैसा सब मिट जाता है पर यह ख्वाब की रेखा जैसे पहली दफा गहरे रंग से रंग दिया गया हो न तो मिटता है और न दबता है। एक और रंग जो तुमसे पीछे भी उभरता है शायद वो तुमसे छुपा भी नहीं है। बहरहाल जियो जी भर कर बस खुद को पहले नहीं बताया अब बताना, महीने के जड़-टुक्के में खबर लिख भेजना। खूब प्रेम करना, प्रेम देना परिवेश खुशनुमा करना।