Posts

सोचता हूँ...

कई रोज से लिख नहीं पाया, याद रोज की है- आज बस में हूँ, वैसे ही जैसे आपने जिक्र किया था  सफर लम्बा है, बगल में अभी किशोर युवा लड़का है, जोकि स्पीकर में प्रेमिका से बतिया रहा है और चैट में किसी और से उसे मेरे या बस में किसी के होने से फर्क नहीं पड़ता। हाँ मैं कई रोज से सोच रहा हूँ जो उसमें आता हूँ. सोचता हूँ, रात के अंधेरे मेंज़ चमकती गाड़ियों की हेडलाइटें क्या बयां कर रही होती है... फिर सोचता हूँ, सुबह-सबेरे, नहा-धोकर, माथे में तुम्हारे छोटी सी लाल बिंदी जँचती तो होगी न फिर सोचता हूँ किसी रोज बड़ी सी बिंदिया तुम्हारे चेहरे को चार चाँद लगा देती होगी... फिर लिखूंगा... सप्रेम💐

जन्मबार

   अप्रैल का यह दिन मई में याद आया,               माफ करना बलना,   तुमने सदा याद रखा, मैंने हर बार भुलाया।

खग ही जाने खग की भाषा

खग ही जाने खग की भाषा प्रेम करने वाला ही जाने प्रेम क्या है  मुझे तुमसे या तुमसे पहले भी कइयों से जुड़ाव रहा लगाव रहा तुम्हारे बाद भी है और ऐसा नहीं कि आकर्षण होना बंद हो गया है।  मार्ग है यह होता ही है।  हाँ पर अब बचपना नहीं है, खुद तक सीमित है और सबसे जरूरी क़ि तुम एक मानक रेखा सी हो पीछे एक रबड़ से पेंसिल जैसा सब मिट जाता है पर यह ख्वाब की रेखा जैसे पहली दफा गहरे रंग से रंग दिया गया हो न तो मिटता है और न दबता है। एक और रंग जो तुमसे पीछे भी उभरता है शायद वो तुमसे छुपा भी नहीं है। बहरहाल जियो जी भर कर बस खुद को पहले नहीं बताया अब बताना, महीने के जड़-टुक्के में खबर लिख भेजना। खूब प्रेम करना, प्रेम देना परिवेश खुशनुमा करना।

मोहोब्बत

इश्क़ भला कैसे दोतरफा होता है,   इश्क़ की दोषी होती है निगाहें, निगाहें होती है केवल एक तरफ़ा,              सीधी और सामने। फर्क जज्बातों का है हालातों का है, मैं उस जैसा नहीं फेर सकता कलम बस इतना है कि मेरे परिवेश में निर्णय की परवरिश नहीं हुई जिसका मैं भोगी हूँ।

बात उन दिनों की है।

साल बीत रहा है खैर खबर की बात है। बात उन दिनों की है,  न तुझमें थी अल्हड़ता न मुझमें अल्हड़ता थी तब, तुम थे सभ्य, संयमी, शिष्ट पर मैं था जरा भीरू जब, क्यों नहीं बढ़ सके आगे सोचता हूँ,  मैं खुली किताब सा सिर्फ पढ़ाने को था, तुम नवेली कलम सी भरी बस उतारू सारे शब्द उतारने को, मैं जरा गौर से झाँकता हूँ अब तो पाता हूँ कि नवेली कलम नवेली नहीं थी एक डायरी समेटे कई राज दफन करती रहती थी वो, शायद खुल सकती थी उसकी लेखनी पर मैं ही मूरख था कभी उसे पढ़ने की कोशिश ही नहीं की। चलो याद करता हूँ तुम्हें कई दफा सोचते हुए बता दूँ अकेले में, जान लो।        खुश हूँ, तुम खुश हो, जानकर..? तुम्हें एक हसीं सफर का ख्वाब मानकर।
Image
दिल में उग आई हैं इतनी उलझनों की झाड़ियाँ     तेरी यादों के जो बाग़ीचे थे जंगल हो गए...
खुद को गिराने में खुद भी भूमिका तो रही होगी, उन्हें अंधेरा लगा हमारे हृदय में बहुत। अंधेरा न सही खैर धूमिका तो रही होगी।