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शरद...

नसीहतें...! नहीं !  शिकायतों का अंबार लगा गया,               कहा तो नहीं पर शायद कहना था,                        मैं बदल रहा हूँ,                      जरा सा भावुक वो, ले गया, जहाँ अक्सर मैं भटकाव के बाद जाया करता हूँ,                     कहता है याद है तुझे.?                  रात पेशानी में बड़ा जोर रहा मेरे..                                  क्या भूल गया मैं.?         संवरते-संवरते कहीं बिखरने लगा हूँ शायद.!         या फिर बिखरा सा था कभी सँवरा ही नहीं,                         जो भी हो... मेरे लड़खड़ाने की आवाज़ तुझ तक पहुंच तो रही है न,     फिर भी अडि...

वक्ती इश्क़

एक शहर था, मैं था, ठिया था, ठियेदारी थी, अर्जी थी, अर्जीनवीस थे, बातें थी, रातें थी, कुछ नींद थी, कुछ उनींद थी, शहीदी की जमात थी, तरकस था, तीर थे, अनेकों मगर वीर थे, एक तीर, मगर सटीक, खाल...

बिंदू

बिंदू अगस्त महीने के आखिरी दिन हल्की धूप और हवा के बीच आँगन में कुर्सी डालकर तीन लोग बैठे थे।   अचानक ही जोर से रोने के साथ मंद सी आवाज़ सुनाई देती है   इतना ही था फिर साथ हां   बिंदु के गले में हाथ डालकर 77-78 वर्षीय दीलपु कह रहा था। बिंदु यानि दीलपु के लम्बे सँघर्ष की सहगामिनी , उसकी पत्नी जो पिछले 5-6 महीने से लगातार बीमार चल रही थी। दीलपु के बच्चों ने बहुत से डॉक्टरों को दिखाया तो किंतु कोई समाधान नहीं निकला था , वह पेट सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रही थी।   बिंदु उमर में दीलपु से बहुत छोटी थी , इस समय उसकी उमर 54-55 वर्ष की थी पर बीमारी , संघर्ष और आँखों पर लगे मोटे चश्मों से वो दीलपु से भी अधिक उमर की दिखती थी। दीलपु और बिंदु की कहानी का शायद ये अंतिम दौर था। इनकी कहानी शुरू होती है शोबन सिंह नाम के दो बुड्ढों की वार्तालाप से , जिसमें वो अपने बच्चों के विवाह की चर्चा कर रहे हैं। बड़ा रोचक लगता है कि बिंदु और दीलपु दोनों के पिता का नाम शोबन सिंह ही था। शायद इसी वजह से इनके संघर्षों की साझा गाड़ी भी चल निकली थी। जिस समय इनका विवाह हुआ दीलपु...

तेरे जाने के बाद

हर रात भीगी सी रही जब, बिन सहारे सो न पाया तेरे जाने के बाद, हर कोना काटने है दौड़ता, उस घर मैं जा न पाया तेरे जाने के बाद, बातें बहुत हुई मगर, किसी की सुन न सका तेरे जाने के बाद, खेला नहीं शतरंज ताउम्र मगर, कोई हरा न सका तेरे जाने के बाद, करहन भुला न सूरत तेरी, दर्द मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद, रुंआसा हर रोज रहा, रोना मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद,

दंगा....

बारिश ने जमाई ऐसी कीच अबकी,      अक्ल ठिकाने आ गई है सबकी, लिबास तो नहीं बिगड़े, हृदय रंगे हुए है,                 सुना है फिर से दंगे हुए है. कुछ तो चिराग मिटे, कुछ बेघर ही हुए है, अभी और भी कितना टूटेगा क्या मालूम, अभी हाल-ए-समाज जर्जर हुए है, ये किस तिलिस्म की आगोस में हैं जहाँ वाले भगवान, बिगड़ा उनका नहीं जो दंगाई थे, इतिहास देखो जहाँ दंगा हुआ है, वो शान से फले-फुले हैं, बस हर बार जमींदोज तिरंगा हुआ है.

सपनों की कब्रगाह-: नौकरी

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तीन साल नौकरी के हो गए आज, सपनों के पेड़ बालमन से ही गहन जड़े जमाये हुए थे, जो कभी नाउम्मीदी के भयकंर दौर से गुजरे तो कभी उम्मीदों के चरमोत्कर्ष से। बड़ा गहरा दर्द सा जमा महसूस हो रहा है, कहने को पाया-खोया बहुत कुछ यहाँ आकर आंकलन करने का मन था तो लिखने बैठ गया। आज ही के दिन तीन वर्ष पूर्व सरकार की नौकरी करने को देहरादून शहर में प्रविष्ट हुआ था। नौकरी से वैसे तो पुराना नाता रहा है, प्रथम बार 12वीं करने के बाद  प्रयास शुरू कर दिया था। नौकरी का पहला अवसर सेवायोजन कार्यालय द्वारा आयोजित रोजगार मेले के माध्यम से चयनित होकर एक सुरक्षा कम्पनी में चयन से मिला। चयन होने की थोड़ी-बहुत खुशी थी। BPL श्रेणी के अंतर्गत होने से फ्री ट्रेनिंग हेतु इसी शहर देहरादून का रूख हुआ। साल था 2009 जब 12वीं बस उत्तीर्ण ही कि थी, सेलाकुइं के निकट कहीं राजावाला के जंगल मे था वो ट्रेनिंग सेंटर जहाँ से मात्र 4 दिनों में ही मात्र 6000₹ जमा न कर सकने के कारण निष्काषित कर दिए गए थे। सपने टूटने का अनुभव तो बचपन से ही था, फिर भी रुआंसा सा मन लेकर वापसी की ओर रूख किया। जेब में टिकट के बराबर ही मात्र ₹ ...

आज मैं बेगार लिखता हूँ।

संघर्षों की लहरें नहीं, शांति का कगार लिखता हूँ, चमचमाते शहर नहीं, अंधकार का पहाड़ लिखता हूँ, ताजा समाचार नहीं, रात्रि छप जाने वाला अखबार लिखता हूँ, सपनों की कब्र पर महिनान्त म...

साला दोस्त

बात उन दिनों की है जब हम दुनिया की सैर किया करते थे, अलग-अलग देशों के नाम अपने अनुसार रख लिया करते थे। उस शाम एक अलग रूप देखने को मिला उसका जब हम अफ्रीकी देशों में घूमते हुए नया ब...

एक और साल बीता

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एक और खुशनुमा साल, बीता तेरे बगैर, खुशफ़हमियां सारी ख़त में लिखी मिलेंगी पढ़ लेना, पढ़ना न आये अब तक भी तो पढ़वाकर कर सुन लेना, सिरोलों की महक़, पिनालु उबले, पा लेता हूँ देख लेना, पांव के छाले, खड़ी चढ़ाई की थकन, जला हुआ खाना भी खा लेता हूँ देख लेना. शाम की तन्हाई, ठंडी-ठंडी छांई, मर जाने की दुहाई कभी दोहराता हूँ सुन लेना, फिर रात भर जगकर देखा है तेरे दर्द को, जरा सी आँख लगी तो मर जाऊँ देख लेना, कुछ रिश्तों की खाइयाँ अब तक वैसी है, तेरे जाने से क्या हुआ, हो सके तो आकर भर देना, अगली दफे खुदा इंसाफ करना, दुनिया छीन लेना पूरी, मां को मेरे हिस्से कर देना... 04 सितम्बर, 2012  

वो...

मेरी कलम थामकर लिखता है, बेशकीमत है फिर भी बिकता है, नासमझ तो जरा भी नहीं असरार जानता है, जाने पर उसे सूरज में भी चाँद दिखता है...! लिखने को सीरसागर भरा पड़ा है उसकी स्याह में, मग़र....! व...

ईजा कहाँ से लाऊंगा

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थक सा गया हूँ साहब कितना चलूंगा..? सामर्थ्य खत्म हुआ अब, मैं अजा कहाँ से लाऊंगा..? थक-हार मां की गोदी में सिर रख देते होंगे न तुम साहब, गोद किराए की मिले भी अब, मैं ईजा कहाँ से लाऊंगा..? लम्बा सफर है जीवन का ज्योतिष कह गया था मुझे, अगर चाहूं तो भी कजा कहाँ से लाऊंगा..? सब हैं साहब यहाँ, पर मैं ईजा कहाँ से लाऊंगा...?

एक कमीज वाला-2

आज फिर देखा मैंने वो लड़का ............................. हाँ.......!   वही "एक कमीज वाला"...      उसका बचपन बड़ा अजीब था..."ना कागज की कश्ती थी ना बारिश का पानी, था तो एक अभाव में पनपा शरीर और एक अनसुलझा धागा इस दौर-ए-ज़...