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असंख्य लोगों में एक चेहरा होना, चेहरे में असंख्य होना दोनों पृथक है,  ठीक वैसे ही जैसे मालगाड़ी में असंख्य पेटियां और पेटी में असंख्य डब्बों का होना।
खैनी की तरह रगड़ खाती जिंदगी में सुकून इस चीज का है कि रगड़ने वाले तो इसका मज़ा ले पाते हैं।
किताब बना डाली है, गलतियां बताकर, उस शख्स का रूप, रुख, रूह सब निखर के सामने है, कुछ दूरियां पाई है, नजदीकियां बढ़ाकर।

ज़िंदगी

सोचा था अपनी ज़िंदगी खर्च कर मुनाफा कमाऊँगा, इस मुनाफ़े से कई घर रोशन करूँगा, पर जिंदगी तो बड़ी छोटी निकली, अब सोचता हूँ, इसे खर्च करूँ कि सवारूँ।

अतीत के फैसले

लेते रहे फैसले बेतुके, बढ़ते रहे फासले बेतुके, हम ढांकते रहे, वो गलतियां दोहराये तिहराये, हमें सुकूँ न रहा, उन्हें जुनूँ न रहा, भारी पड़ते रहे, पर हम लेते रहे, बड़े दुख भरे से दिखे, पीछे जो देखा, बड़े बोझिले से दिखे मुझे अतीत के फैसले।

ईजा कैसी थी मेरी

कोई पूछ बैठा ईजा कैसी थी मेरी. स्वच्छंद थी, गम्भीर थी विलक्षण थी, निर्दिष्ट थी श्लाघ्य थी, दारुण थी रौद्र थी, संचित थी पथिक थी, प्राचीर थी विरक्त थी, पुलकित थी किंकर्तव्यविमूढ़‌ थी, विस्मित थी, अलौकिक थी, महि थी, मेरी अँखिया थी, अंकोर थी, इष्टतम थी, उर्मिला थी।

शब्दों चलो

शब्दों चलो जाओ दूर जंगल में, अंतिम छोर में गाँव के, जहाँ रात होते ही सन्नाटा काटने दौड़ता है, उसी सन्नाटे की सह में आशियाँ बनाते है। शब्दों चलो जाओ दूर सहर के, साँझ की गोद में, जहाँ उजियारा भी दम तोड़ देता है, उसी गोद में सर रखकर कुछ गुनगुनाते है। शब्दों सुनों लौट चलो उस कलम में, लहू बनकर उतरते हो जहाँ तुम, जहाँ राग-ताल बिना जहाँ नाचना होता है, उसी लहू के कतरों को बताना है, उनसे कहना दुःखी हूँ मैं,  पता नहीं क्यों, कोई वाजिब कारण तक नहीं है।