खग ही जाने खग की भाषा
खग ही जाने खग की भाषा
प्रेम करने वाला ही जाने प्रेम क्या है
मुझे तुमसे या तुमसे पहले भी कइयों से जुड़ाव रहा लगाव रहा
तुम्हारे बाद भी है और ऐसा नहीं कि आकर्षण होना बंद हो गया है।
मार्ग है यह होता ही है।
हाँ पर अब बचपना नहीं है, खुद तक सीमित है
और सबसे जरूरी क़ि तुम एक मानक रेखा सी हो पीछे एक रबड़ से पेंसिल जैसा सब मिट जाता है पर यह ख्वाब की रेखा जैसे पहली दफा गहरे रंग से रंग दिया गया हो न तो मिटता है और न दबता है।
एक और रंग जो तुमसे पीछे भी उभरता है शायद वो तुमसे छुपा भी नहीं है।
बहरहाल जियो जी भर कर बस खुद को पहले नहीं बताया अब बताना, महीने के जड़-टुक्के में खबर लिख भेजना।
खूब प्रेम करना, प्रेम देना परिवेश खुशनुमा करना।
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