सोचता हूँ...
कई रोज से लिख नहीं पाया, याद रोज की है-
आज बस में हूँ, वैसे ही जैसे आपने जिक्र किया था
सफर लम्बा है,
बगल में अभी किशोर युवा लड़का है,
जोकि स्पीकर में प्रेमिका से बतिया रहा है
और चैट में किसी और से
उसे मेरे या बस में किसी के होने से फर्क नहीं पड़ता।
हाँ मैं कई रोज से सोच रहा हूँ जो उसमें आता हूँ.
सोचता हूँ,
रात के अंधेरे मेंज़
चमकती गाड़ियों की हेडलाइटें
क्या बयां कर रही होती है...
फिर सोचता हूँ,
सुबह-सबेरे,
नहा-धोकर,
माथे में तुम्हारे
छोटी सी लाल बिंदी
जँचती तो होगी न
फिर सोचता हूँ
किसी रोज बड़ी सी बिंदिया
तुम्हारे चेहरे को चार चाँद लगा देती होगी...
फिर लिखूंगा...
सप्रेम💐
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