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मैं आँसू क्यों न बहाऊँ

मैं आँसू क्यों न बहाऊँ.? जिस रोज अकेला पड़ जाऊँ, फिकर किसे खाऊं या बिन खाये सो जाऊँ. देर सबेर घर से निकलूँ, घर आऊँ, तिबारी में झाँकता सिर न पाऊँ, अंधेरा जरा बढ़ जाये, दाज्यू घर न आये, समय हो जब खाने का धाद किसे लगाऊँ, दूर कहीं से आऊँ, न छांछ, न छांव पाऊँ, वैसी ही लाड़ भरी नजरें कहाँ से मैं लाऊँ, गाँव जाऊँ, बल्द-गोरु तो फिर से पालूं, फेरते न रहना गोरुं को पानी पिला देना,       वो गरजती आवाज़ कहाँ से लाऊँ.? रंगीन दुनिया में सब तरह के लोग हैं ईजा, झुकी कमर, मोटा चश्मा, थकी हुई सांसे,     मैं उस खुदा को कैसे भूल जाऊँ,          मैं आँसू क्यों न बहाऊँ?

भाव शून्य

भाव शून्यता भी एक भाव है, ईजा का न होना भी एक घाव है, तू न समझेगा जाने दे भगवान इसे, तेरे सर पर अभी ईजा की छांव है। 8 साल (04 सितम्बर, 2012)

सावन यानि देवताओं का कैलाश काल

सावन का महीना और आप यदि सीमांत के किसी गाँव मे जाते हैं तो हर घर में एक ही चीज आम होगी वो हर घर के दरवाजे और खिड़कियों में लगे काटें और बिच्छू घास की टहनियां। ये किसी भी नये व्यक्ति के किये कौतूहल हो सकता है पर सीमांत के लिए ये एक परम्परा है जो सदियों से चली आ रही है। सावन को काला महीना कहा जाता है इस माह में कोई शुभ कार्य नहीं किये जा सकते क्योंकि इस काल में आराध्य देवता कैलाश वास में होते हैं। सावन के शुरू होने से पहले गाँवों में पूजा शुरू हो जाती हैं, देवता अपने धामी/पश्वा में अवतरित होकर बताते हैं कि वे इस तिथि को कैलाश जा रहे हैं, हर बरस की भांति किसी एक देवता को ग्राम रक्षा की जिम्मेदारी भी मिलती है। वो सब इसी दिन तय हो जाता है देवता चेताते हैं कि हमारी अनुपस्थिति में क्या नहीं करना हैं और कैसे बचे रहना है।  सावन शुरू होने से पूर्व की शाम को ही सिन्ना(बिच्छू), किलमोड़ा और ऐरुवा (एक विशेष प्रकार का कांटेदार झाड़ीनुमा पौधा) लेकर लोग अपने घरों के दरवाजों, खिड़कियों तथा गोठ(पशु निवास स्थल) में लगा देते हैं मान्यता हैं कि देवताओं की अनुपस्थिति में कोई बुराई घर में प्रवेश न कर सके इसलि...

शब्द

रच लेते हैं कुछ शब्द ही एक कहानी को, कभी शब्दों की अपनी कहानी नहीं होती। कतरा-कतरा बयां कर देते हैं हर दर्द को, कभी शब्दों की अपनी जुबानी नहीं होती।। भेद लेते हैं हाड़-माँस के आदमी को, कभी शब्दों को अपनी कटार चलानी नहीं होती।। जरूरतानुसार बेच लेते हैं खुद को, कभी शब्दों को अपनी दुकान सजानी नहीं होती।  जीत लेते हैं पिछड़ के भी दिलों को, कभी शब्दों की अपनी अगवानी नहीं होती। खुद ही बना लेते हैं हरफ़ ये खरीददार को, कभी शब्दों की अपनी जजमानी नहीं होती।। पलट लेते हैं हर धारा की दिशा को, कभी शब्दों की अपनी नौजवानी नहीं होती। स्वयं घेर लाते है मेहमानों को, कभी शब्दों की अपनी मेजबानी नहीं होती।।

शरद...

नसीहतें...! नहीं !  शिकायतों का अंबार लगा गया,               कहा तो नहीं पर शायद कहना था,                        मैं बदल रहा हूँ,                      जरा सा भावुक वो, ले गया, जहाँ अक्सर मैं भटकाव के बाद जाया करता हूँ,                     कहता है याद है तुझे.?                  रात पेशानी में बड़ा जोर रहा मेरे..                                  क्या भूल गया मैं.?         संवरते-संवरते कहीं बिखरने लगा हूँ शायद.!         या फिर बिखरा सा था कभी सँवरा ही नहीं,                         जो भी हो... मेरे लड़खड़ाने की आवाज़ तुझ तक पहुंच तो रही है न,     फिर भी अडि...

बलना

एक नाम शहर का पुराना, एक ख़्वाब जाना पहचाना, एक वक्त आना-जाना... कभी उगते हुए सूरज सा उजाला कभी डूब जाने को तैयार अंधियारा, शहर एक ख़्वाब का, क्यों न ख़्वाब शहर ही कहूँ, शहर का जन्मना अक्सर किसी को याद नहीं रहता, एक शहर का मर जाना इतिहास में दर्ज हो जाता है।

मैं और मेरी जिंदगी...

बड़ी हसरतों से बोए थे दो ख्वाब, एक सुबह ने तोड़ी, एक शाम ने..