फाम
याद कर लेता हूँ,
रविवार को
या खाली पड़े समय में अक्सर,
दिमाग की परतों में दबी हुई तुम
उभर आती हो सम्मुख उसी रूप में,
जैसे हुआ करती थी उन दिनों।
फिर कुछ पल को लगता है,
जैसे वक्त वहीं ठहर गया हो…
तुम सामने हो, मैं वही हूँ,
बस अब उन पलों को जीने का हक़ नहीं रहा।
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