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जीवन

जीवन लग जाता है जीवन बनाने में एक जीवन है कि उसका कोई हिसाब नहीं है।               ए जीवन चल कि मिल के बात करें आज             एक रास्ता मैं बनाता हूँ एक रास्ता तू भी बना         ...

माँ

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ये दिन ये वक्त बिल्कुल वही है हूबहू वही है यूँ तो रात भर सोया मैं भी ना था   आँखे पथराई थी मेरी हाँ लोग कहते भी है जाने वालों के लिए कौन रोता है पर  याद तो है मुझे माँ पापा की गोद म...
आज के समय में पहाड़ के गांव जिस तरह ख़ाली हो रहे हैं उस दशा में पहाड़ की दशा देखें किस तरह रो रहा हैं पहाड़ । अरे विकास के ठेकेदारों पलायन की गति तो देखो विकास तुम्हारा कहाँ गया? रो...

बहुत मज़ेदार है ये हार।

कभी क्रोध भर जाता है तो कभी ढूंढने लगते प्यार कभी चलना भी दूबर होता कभी दौड़ने लगती कार अन्य विकल्पों को गर सोचें तो हैं बहुत मज़ेदार ये हार अहम् भाव को तोड़ती है सही राह में मो...

क्या

ओ समाज-समाज रोने वालों कभी समाज को देखा है क्या आधी थालियां फेंकने वालों भूखे की आँखे देखि है क्या बड़ी-बड़ी फेंकने वालों कभी किसी गरीब का हाथ थामा है क्या पैसे की भूख में मरने ...

आज का युवा

बीत चुका बचपन ढल रही जवानी अक्ल अब तक न आई ये है आज के युवा की कहानी कॉलेज है पूरा होने को आया अब आगे की है परेशानी हो गए बाहर हर इंटरव्यू में अब याद आई मस्तियों की रवानी पढ़ा ह...

14 अगस्त 2009 को लिखी गयी पंकियां

पक्षियों की चहचहाहट में, भौरों की गुनगुनाहट में, मुझे जीवन का खालीपन नज़र आता हैं। पत्तो की सरसराहट में, पशुओं की फुसफुसाहट में, मुझे जीवन का सूनापन नज़र आता हैं। सूरज की गरमा...