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क्या!     अरे..

एकांत! उस तरफ पीठ, निगाहें! भीगी हुई डीठ, मैला आँचल! नई फसल की रीठ, सर्द हवा! जली हुई अंगीठ, छुरा! मित्र की पीठ, शर्म! बेहया अव्वल ढीठ, पहचान! कद बड़ा गरीठ, गुण! जैसे फल कवीठ, ज्ञान! चला...

वक्ती इश्क़

एक शहर था, मैं था, ठिया था, ठियेदारी थी, अर्जी थी, अर्जीनवीस थे, बातें थी, रातें थी, कुछ नींद थी, कुछ उनींद थी, शहीदी की जमात थी, तरकस था, तीर थे, अनेकों मगर वीर थे, एक तीर, मगर सटीक, खाल...

बिंदू

बिंदू अगस्त महीने के आखिरी दिन हल्की धूप और हवा के बीच आँगन में कुर्सी डालकर तीन लोग बैठे थे।   अचानक ही जोर से रोने के साथ मंद सी आवाज़ सुनाई देती है   इतना ही था फिर साथ हां   बिंदु के गले में हाथ डालकर 77-78 वर्षीय दीलपु कह रहा था। बिंदु यानि दीलपु के लम्बे सँघर्ष की सहगामिनी , उसकी पत्नी जो पिछले 5-6 महीने से लगातार बीमार चल रही थी। दीलपु के बच्चों ने बहुत से डॉक्टरों को दिखाया तो किंतु कोई समाधान नहीं निकला था , वह पेट सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रही थी।   बिंदु उमर में दीलपु से बहुत छोटी थी , इस समय उसकी उमर 54-55 वर्ष की थी पर बीमारी , संघर्ष और आँखों पर लगे मोटे चश्मों से वो दीलपु से भी अधिक उमर की दिखती थी। दीलपु और बिंदु की कहानी का शायद ये अंतिम दौर था। इनकी कहानी शुरू होती है शोबन सिंह नाम के दो बुड्ढों की वार्तालाप से , जिसमें वो अपने बच्चों के विवाह की चर्चा कर रहे हैं। बड़ा रोचक लगता है कि बिंदु और दीलपु दोनों के पिता का नाम शोबन सिंह ही था। शायद इसी वजह से इनके संघर्षों की साझा गाड़ी भी चल निकली थी। जिस समय इनका विवाह हुआ दीलपु...

तेरे जाने के बाद

हर रात भीगी सी रही जब, बिन सहारे सो न पाया तेरे जाने के बाद, हर कोना काटने है दौड़ता, उस घर मैं जा न पाया तेरे जाने के बाद, बातें बहुत हुई मगर, किसी की सुन न सका तेरे जाने के बाद, खेला नहीं शतरंज ताउम्र मगर, कोई हरा न सका तेरे जाने के बाद, करहन भुला न सूरत तेरी, दर्द मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद, रुंआसा हर रोज रहा, रोना मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद,

दंगा....

बारिश ने जमाई ऐसी कीच अबकी,      अक्ल ठिकाने आ गई है सबकी, लिबास तो नहीं बिगड़े, हृदय रंगे हुए है,                 सुना है फिर से दंगे हुए है. कुछ तो चिराग मिटे, कुछ बेघर ही हुए है, अभी और भी कितना टूटेगा क्या मालूम, अभी हाल-ए-समाज जर्जर हुए है, ये किस तिलिस्म की आगोस में हैं जहाँ वाले भगवान, बिगड़ा उनका नहीं जो दंगाई थे, इतिहास देखो जहाँ दंगा हुआ है, वो शान से फले-फुले हैं, बस हर बार जमींदोज तिरंगा हुआ है.

पहाड़

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ये पहाड़ है, प्रकृति का नजारा मात्र नहीं, यहाँ जीवन ही पहाड़ है, उम्र इंसान को ठहरा देती है, और ये आमा उम्र को ठहरा रही है. मेरी ईजा की उम्र ज्यादा तो नहीं थी 55-56 वर्ष की आयु में वो स्वर्गवासी हो गई थी. पर उनपर भी पहाड़ जैसा बोझ कुछ इस तरह ही था लगता है। कमर यूँही झुकी हुई थी, काम इस तरह ही कठिन। मैं अक्सर कहा करता था आराम कर आराम करने के दिन है। ये भी कोई काम करने के दिन है तो वो कहती कुछ नहीं थी बस मुझपर शादी का बोझ डालने को कहती थी और मैं हमेशा शादी की बात से भाग जाया करता, और मुद्दा यहीं समाप्त हो जाया करता. वो रोजमर्रा के इन्हीं कामों में और मैं अपने आप में अपनी दूसरी दुनिया बनाने में मग्न.  याद आता है हज़ारों फ़ीट ऊंची ऐसी पहाड़ियां जहां से कुछ गिर जाता तो वो नीचे 2-3 हजार फ़ीट की गहराई नापता। 2013 में मेरी एक मुंहबोली दीदी ऐसी ही पहाड़ी से गिर गई थी। मैं तो घर में न था पर लोगों ने बताया कि उनके शरीर को मात्र 5 किलो की थैली में भरके लाया गया था। इस तरह के कठिन जगहों में मेरी ईजा घास काटने जाती थी वो भी लगभग इतनी ही कमर झुकी झर्रियों से भरा चेहरा, मोतियाबिंद का ऑपरेशन के...

सपनों की कब्रगाह-: नौकरी

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तीन साल नौकरी के हो गए आज, सपनों के पेड़ बालमन से ही गहन जड़े जमाये हुए थे, जो कभी नाउम्मीदी के भयकंर दौर से गुजरे तो कभी उम्मीदों के चरमोत्कर्ष से। बड़ा गहरा दर्द सा जमा महसूस हो रहा है, कहने को पाया-खोया बहुत कुछ यहाँ आकर आंकलन करने का मन था तो लिखने बैठ गया। आज ही के दिन तीन वर्ष पूर्व सरकार की नौकरी करने को देहरादून शहर में प्रविष्ट हुआ था। नौकरी से वैसे तो पुराना नाता रहा है, प्रथम बार 12वीं करने के बाद  प्रयास शुरू कर दिया था। नौकरी का पहला अवसर सेवायोजन कार्यालय द्वारा आयोजित रोजगार मेले के माध्यम से चयनित होकर एक सुरक्षा कम्पनी में चयन से मिला। चयन होने की थोड़ी-बहुत खुशी थी। BPL श्रेणी के अंतर्गत होने से फ्री ट्रेनिंग हेतु इसी शहर देहरादून का रूख हुआ। साल था 2009 जब 12वीं बस उत्तीर्ण ही कि थी, सेलाकुइं के निकट कहीं राजावाला के जंगल मे था वो ट्रेनिंग सेंटर जहाँ से मात्र 4 दिनों में ही मात्र 6000₹ जमा न कर सकने के कारण निष्काषित कर दिए गए थे। सपने टूटने का अनुभव तो बचपन से ही था, फिर भी रुआंसा सा मन लेकर वापसी की ओर रूख किया। जेब में टिकट के बराबर ही मात्र ₹ ...