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बलना

एक नाम शहर का पुराना, एक ख़्वाब जाना पहचाना, एक वक्त आना-जाना... कभी उगते हुए सूरज सा उजाला कभी डूब जाने को तैयार अंधियारा, शहर एक ख़्वाब का, क्यों न ख़्वाब शहर ही कहूँ, शहर का जन्मना अक्सर किसी को याद नहीं रहता, एक शहर का मर जाना इतिहास में दर्ज हो जाता है।

मैं और मेरी जिंदगी...

बड़ी हसरतों से बोए थे दो ख्वाब, एक सुबह ने तोड़ी, एक शाम ने..

क्या!     अरे..

एकांत! उस तरफ पीठ, निगाहें! भीगी हुई डीठ, मैला आँचल! नई फसल की रीठ, सर्द हवा! जली हुई अंगीठ, छुरा! मित्र की पीठ, शर्म! बेहया अव्वल ढीठ, पहचान! कद बड़ा गरीठ, गुण! जैसे फल कवीठ, ज्ञान! चला...

वक्ती इश्क़

एक शहर था, मैं था, ठिया था, ठियेदारी थी, अर्जी थी, अर्जीनवीस थे, बातें थी, रातें थी, कुछ नींद थी, कुछ उनींद थी, शहीदी की जमात थी, तरकस था, तीर थे, अनेकों मगर वीर थे, एक तीर, मगर सटीक, खाल...

बिंदू

बिंदू अगस्त महीने के आखिरी दिन हल्की धूप और हवा के बीच आँगन में कुर्सी डालकर तीन लोग बैठे थे।   अचानक ही जोर से रोने के साथ मंद सी आवाज़ सुनाई देती है   इतना ही था फिर साथ हां   बिंदु के गले में हाथ डालकर 77-78 वर्षीय दीलपु कह रहा था। बिंदु यानि दीलपु के लम्बे सँघर्ष की सहगामिनी , उसकी पत्नी जो पिछले 5-6 महीने से लगातार बीमार चल रही थी। दीलपु के बच्चों ने बहुत से डॉक्टरों को दिखाया तो किंतु कोई समाधान नहीं निकला था , वह पेट सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रही थी।   बिंदु उमर में दीलपु से बहुत छोटी थी , इस समय उसकी उमर 54-55 वर्ष की थी पर बीमारी , संघर्ष और आँखों पर लगे मोटे चश्मों से वो दीलपु से भी अधिक उमर की दिखती थी। दीलपु और बिंदु की कहानी का शायद ये अंतिम दौर था। इनकी कहानी शुरू होती है शोबन सिंह नाम के दो बुड्ढों की वार्तालाप से , जिसमें वो अपने बच्चों के विवाह की चर्चा कर रहे हैं। बड़ा रोचक लगता है कि बिंदु और दीलपु दोनों के पिता का नाम शोबन सिंह ही था। शायद इसी वजह से इनके संघर्षों की साझा गाड़ी भी चल निकली थी। जिस समय इनका विवाह हुआ दीलपु...

तेरे जाने के बाद

हर रात भीगी सी रही जब, बिन सहारे सो न पाया तेरे जाने के बाद, हर कोना काटने है दौड़ता, उस घर मैं जा न पाया तेरे जाने के बाद, बातें बहुत हुई मगर, किसी की सुन न सका तेरे जाने के बाद, खेला नहीं शतरंज ताउम्र मगर, कोई हरा न सका तेरे जाने के बाद, करहन भुला न सूरत तेरी, दर्द मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद, रुंआसा हर रोज रहा, रोना मगर याद न रहा तेरे जाने के बाद,

दंगा....

बारिश ने जमाई ऐसी कीच अबकी,      अक्ल ठिकाने आ गई है सबकी, लिबास तो नहीं बिगड़े, हृदय रंगे हुए है,                 सुना है फिर से दंगे हुए है. कुछ तो चिराग मिटे, कुछ बेघर ही हुए है, अभी और भी कितना टूटेगा क्या मालूम, अभी हाल-ए-समाज जर्जर हुए है, ये किस तिलिस्म की आगोस में हैं जहाँ वाले भगवान, बिगड़ा उनका नहीं जो दंगाई थे, इतिहास देखो जहाँ दंगा हुआ है, वो शान से फले-फुले हैं, बस हर बार जमींदोज तिरंगा हुआ है.