Posts

   रोशनी रास नहीं आ रही सहर की अब,      ख्वाब तो रंगीन ही हैं रोज की तरह,     आबो हवा बदल गई है शहर की अब। कुछ पहचानी सी चल रही है हवा सब पहर की अब,   मुखातिब होगा जाने वो शख्स किस दोपहर अब....

मेरी वर्णमाला

अ से अनार आ से आम वर्णमाला के इस रूप रंग से परिचित लोगों के लिए मेरी ओर से एक नई वर्णमाला, जो पग-पग पर बदलती रहती है, समय-समय पर बदलती रहती है इसके विविध रंगों और रूपों को पिरोना और फिर उसे वर्णमाला के रूप में बुनकर साज-सज्जा देकर रंगना शायद बेहतर विकल्प हो सकता था फिर भी इसे रंगना एक बेहतर विकल्प है। अ से अखबार कहूँ, नित का आ से कहूं आतंक, हित का इ से कहूँ  इबारत कहूँ, ई से कहूं ईशान, राष्ट्र का उ से कहूँ उत्तर, भ्रष्ट का ऊ से मैं ऊखल रहन दूँ,  ऋ से ऋग्वेद लिख डालूं। ए से बस मैं एक हो जाऊं, ऐ से ऐरा-गैरा बन जाऊं, ओ से ओढ़ लूँ हया को, औ से औरत बनने दूँ। अंक से अंकगणित बन जाऊं, अ: को मैं पुनः बनाऊं। इन स्वरों को पुनः रचाऊं। क से कला बनूँ कलाकार की, ख से खड़ाऊँ बन जाऊं, ग से गगन बनूँ असीमित, घ से घर को घर रहने दूँ। ङ को भी न छोड़ूँ खाली, बनाऊं इसे भी सवाली। च से चल पडूँ सफर में, छ से छप जाऊं जगत में, ज से जहान को कर दूं एक। झ से झरना बन जाऊं ञ को बहाकर आगे ले जाऊं
    जस असौजक काम आईजां, कबे-कबार तेरी उसी फाम आईजां। आफतकी बख्त जस मुखमे राम आईजां,       मेर मुखमे तेर नाम आईजां.

फाम

सोचा धुँधला गया पर, तरेर रहा है जेहन में वो नाम,                  एक कदम आगे बढ़ चलो जरा, तो, लौट आती है बीतें चार दिनों की फाम..।

...*

कलम में स्याही नहीं लहू भर गया है, आते-जाते सरे राह टोकता नहीं कोई यूँ लगता है मेरे अंदर का वो मर गया है। कुछ रौनक सी कुछ चहल-पहल सी लौटी है, लगता है, जाते-जाते वीराने को आबाद कर गया है। शुष्क है बाहर का मौसम पर भीग गया हूँ, यूँ लगता है भीतर कोई बरस कर गया है।

साला दोस्त-2

दिन बीते, महीने बीते और फिर साल बीते, मैं सोचता हूँ! कि क्या जोड़े रखा हमें इतने समय जबकि मैं साधारण सा बस डरपोक सा और वो हर नई जगह सर्वाइव और शासन करने का साहस रखने वाला व्यक्ति कितने विपरीत हैं हम। मेरे कई सारे राजों को सीने में दफन करने वाला वो शख्स सच में हक़ योगी सा लगता है। पीछे मुड़ता हूँ तो कभी-कभी मुझे लगता है जैसे वो गोद लिया गया हो उसके माँ-बाप कहीं सौतेले न हों। (आश्चर्य एक बार तो पूछ भी लिया था मैंने) ये ख्याल अक्सर तब आता है जब उसका विचार और संघर्ष जो शायद नहीं होने थे साफ-साफ दूर से ही दिखने लगते हैं। बारहवीं करने के बाद कोई बड़ा तो नहीं हो जाता पर मुझे लगता है वो हो गया था। उसकी जिद थी या उसका एकहड़ियापन था कि उसने बस इसी को सार बना लिया था ये उसका बल था कि निर्बलता इस पर मैंने कभी विचार नहीं किया। बारहवीं के बाद उसने अपने हाथों में अपनी जिम्मेदारी ले ली थी जो उसके लिए कब ताकत से कमज़ोरी बन गई कोई जवाब नहीं है इसका। बात शुरुआती मुलाकात से बहुत आगे निकल गई थी मैं अक्सर चर्चाओं में अपनी बातें रख देता था पर उसने कभी अपने बारे में अधिक विस्तार से विवरण पेश नहीं किया। बादलों से घि...

फसल

उदासी अच्छी ना सही पर, हर उदासी बुरी नहीं होती, बीज लाख बो ले किसान लेकिन, हर फसल पूरी नहीं होती.