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जनम बार

इस बार भी लिख कर दफन कर दिया है पहले की तरह, बस दुआ है जिंदगी खूबसूरत बीते, न बीते पहले की तरह

छवि

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सोचता हूँ कैसी होगी... मेरे हिस्से की छवि.? क्या तुमसी होगी... सोचता हूं होगा मुझसा फिकर मंद, खौफ़जदा... या फिर बेफिकर लिखने वाली कलम की तरह.?

दिन

एक वो थे बेफिक्री की रवानगी थी, फिर एक वो आये जब चीजें न थी पर कल्पना संसार था, फिर एक वो आये जब अभाव मालूम हुए, फिर एक वो आये जब अभावों के घेरे से सशंकित हुए, फिर एक वो आये जब कल्पनाएं डराने लगी, फिर एक वो आये जब डर हावी होने लगा, फिर एक वो आये जब दर्द ने इंतेहा तक सताया, फिर एक वो आये जब संघर्ष में गुत्थमगुत्था हुए, फिर एक वो आये जब अंधेरा छँटा, उजाले ने साथ दिया, फिर एक वो आये जब उजाले में अकेला रह गया, फिर एक वो आये जब सिलसिले शुरू हुए जुड़ने के, फिर एक वो आये जब सब छँट कर रह गए, फिर एक वो आये जब सारी टहनियां कट गई एक सिरा रह गया, फिर ये दिन हैं अब भी अकेलेपन की शीशियाँ टूटती हैं तरल बहता है, बस सुरमा नहीं बहता आंखों की कालिख़ आँखों में ही रहती हैं। ये दिन हैं जब तब और अब

कलम सवाली

राहत पूछते नहीं जुबां से हमारे साहब, कलम जब देखो हमेशा सवाली होती है। दौर बहुत लम्बा नहीं था बस यूँ लगता है! एक लम्बी सी किताब थी जिंदगी, पहले से उसने पूरी पढ़ डाली होती है। हर जगह गर्त ही गर्त, पहाड़ ही पहाड़ दिखते है मुझे, न कोई दिल मिलता है इधर, न कोई जगह खाली होती है। कलम उसकी अब भी हमेशा सवाली होती है।

😊

तुम हर नाम मे हो जो भी नाम लूं अपना समझ लेना, तुम हर ख्वाब में हो, जभी सपना कहूँ तुम अपना समझ लेना।

तुम.

सर्द हवा हो जाना जनवरी हो तुम, धीमी सी सही मगर सुरूर में जो आये माह-ए-मुहब्बत फरवरी हो तुम। मार्च का बसन्त हो, अप्रैल की फसल हो, हासिल सारा सूद है, जीवन का तुम असल हो। मई-जून की लू जैसी तुम, कभी नयनों का सावन-भादो हो, जीवन मेरा सूखी भूमि, तुम जुलाई-अगस्त सी कादो हो। सितंबर जैसी बरसाती अंत सा, अक्टूबर-नबम्बर सी पसरी शांति तुम। पके खेत सा शांत खड़ा मैं, उसका तुम रक्षण बाड़ा हो, जीवन के अंत का जाना, दिसंबर जैसा तुम जाड़ा हो।
जो सरे राह पूज लिए जाते हैं उनके मन्दिर-मस्जिद नहीं होते, पीर तो मोमिनों में होते है ख़्वाब, काफिरों के मुर्शिद नहीं होते...