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ज़िंदगी

सोचा था अपनी ज़िंदगी खर्च कर मुनाफा कमाऊँगा, इस मुनाफ़े से कई घर रोशन करूँगा, पर जिंदगी तो बड़ी छोटी निकली, अब सोचता हूँ, इसे खर्च करूँ कि सवारूँ।

अतीत के फैसले

लेते रहे फैसले बेतुके, बढ़ते रहे फासले बेतुके, हम ढांकते रहे, वो गलतियां दोहराये तिहराये, हमें सुकूँ न रहा, उन्हें जुनूँ न रहा, भारी पड़ते रहे, पर हम लेते रहे, बड़े दुख भरे से दिखे, पीछे जो देखा, बड़े बोझिले से दिखे मुझे अतीत के फैसले।

ईजा कैसी थी मेरी

कोई पूछ बैठा ईजा कैसी थी मेरी. स्वच्छंद थी, गम्भीर थी विलक्षण थी, निर्दिष्ट थी श्लाघ्य थी, दारुण थी रौद्र थी, संचित थी पथिक थी, प्राचीर थी विरक्त थी, पुलकित थी किंकर्तव्यविमूढ़‌ थी, विस्मित थी, अलौकिक थी, महि थी, मेरी अँखिया थी, अंकोर थी, इष्टतम थी, उर्मिला थी।

शब्दों चलो

शब्दों चलो जाओ दूर जंगल में, अंतिम छोर में गाँव के, जहाँ रात होते ही सन्नाटा काटने दौड़ता है, उसी सन्नाटे की सह में आशियाँ बनाते है। शब्दों चलो जाओ दूर सहर के, साँझ की गोद में, जहाँ उजियारा भी दम तोड़ देता है, उसी गोद में सर रखकर कुछ गुनगुनाते है। शब्दों सुनों लौट चलो उस कलम में, लहू बनकर उतरते हो जहाँ तुम, जहाँ राग-ताल बिना जहाँ नाचना होता है, उसी लहू के कतरों को बताना है, उनसे कहना दुःखी हूँ मैं,  पता नहीं क्यों, कोई वाजिब कारण तक नहीं है।

शोर

कितना अहम होता है ये शोर जो नहीं सुना जाता, कितना बेदर्द होता है ये चोर जो नहीं चुरा जाता, कितना मजबूर होता है ये छोर जो नहीं मिला जाता। तन्हाई अक्सर आँसू बनकर बह जाती है मेरी, ख़ामोखा के लोगों का होना, तन्हाई नहीं मिटा जाता। अक्सर दम्भ करते हो जिनके होने का तुम, क्या हक़ीक़त में वो साथ नहीं छुड़ा जाता...       ये जो कोलाहल मचा है भीतर तुम्हारे सुनों, कितना अहम होता है ये शोर जो नहीं सुना जाता।

ज़िंदगी

सुनो! बड़ी बेरहम है जिंदगी, जी नहीं सके दो पल तो वहम है जिंदगी। समेट लिए हो कुछ सुकूँ के पल तो अच्छा वरना, दर्द-ए-पैहम है जिंदगी। किसी का होना जब दुःख से सरोबार कर दे तो,  सुनो!  किसी का न होना, मरहम है जिंदगी। किसी हँसी-ठिठोली में रहकर भी कमी रह जाये कहीं तो सुनो! निडर होना भी कभी सहम है जिंदगी।

करने वाले

इश्क़-मुश्क सब करने वाले, अनेकों का जीवन जीने वाले, सुन बाँट के जा ये जोड़ मन का,  ऐ! एक को अनेक करने वाले।           दर्द की दवा दे जा,  ऐ! खुश्क को जरिश्क करने वाले।  कुछ लिख दे, और मोह छुड़ा दे,     कलम का हथियार चलाने वाले।  हरी-भरी दुनिया न जीने वाले,  हसीं जहाँ का गर्क कर चलने वाले,    समतल को सर्क करने वाले,     तल्ख को बर्क करने वाले।