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बात उन दिनों की है।

साल बीत रहा है खैर खबर की बात है। बात उन दिनों की है,  न तुझमें थी अल्हड़ता न मुझमें अल्हड़ता थी तब, तुम थे सभ्य, संयमी, शिष्ट पर मैं था जरा भीरू जब, क्यों नहीं बढ़ सके आगे सोचता हूँ,  मैं खुली किताब सा सिर्फ पढ़ाने को था, तुम नवेली कलम सी भरी बस उतारू सारे शब्द उतारने को, मैं जरा गौर से झाँकता हूँ अब तो पाता हूँ कि नवेली कलम नवेली नहीं थी एक डायरी समेटे कई राज दफन करती रहती थी वो, शायद खुल सकती थी उसकी लेखनी पर मैं ही मूरख था कभी उसे पढ़ने की कोशिश ही नहीं की। चलो याद करता हूँ तुम्हें कई दफा सोचते हुए बता दूँ अकेले में, जान लो।        खुश हूँ, तुम खुश हो, जानकर..? तुम्हें एक हसीं सफर का ख्वाब मानकर।
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दिल में उग आई हैं इतनी उलझनों की झाड़ियाँ     तेरी यादों के जो बाग़ीचे थे जंगल हो गए...
खुद को गिराने में खुद भी भूमिका तो रही होगी, उन्हें अंधेरा लगा हमारे हृदय में बहुत। अंधेरा न सही खैर धूमिका तो रही होगी।
करनी पड़ती है जल से गहरी दोस्ती, आसाँ नहीं सफर-ए-सैल।            सब कुछ नजर भर से है यहाँ, परिधान हो बेशमीमती पहने, या फिर  हो मन का मैल।।
ख्वाब देखा पर उसका मुकम्मल अंजाम न हो सका, शहर वहीं रहा, सफर वही रहा हासिल मुकाम न हो सका.. मैं अपनी तरफ जरा जल्दी में था, वो अपनी बानगी में मग्न थे,  शहर तो बस गया ख्वाबों का, बस शहरयार न बन सके।

बबा की पहली बरसी

पिता-पुत्र से अधिक, ज्यूँ राह के दो पथिक, भोलौलो सीखा, जागर सीखे,  सीखे किस्से, सीखी आपसे कहानियाँ,    बेशक आपने अपनी दुनिया सिखाई, पर आज वह सब ही दे रहा दूर तक दिखाई, आपसे सीखी ताश की पहचान, संग ही जाम छलका मिटाई थकान, अक्सर ईजा पर बहुत लिखा मैंने पर, बबा! आप मेरे लेखों में समाते ही नहीं, आपकी इच्छाओं और रुचियों का स्थान हमेशा सर्वोच्च है और रहेगा।

शुभकामना संदेश..

 सप्तपदी देखी तेरी, सुकूँ भी देखा चेहरे पर,         निभते विधान भी देखा और      नव पथ गमन का परिधान भी देखा। बस इतना कहना है ख्वाब शहर के वाशिंदे तुझे:-    सजी-धजी भी तुम कलन्दर सी लगी, हालाँकि तुम हर हाल में मुझे सुंदर ही लगी..! टीस ये है कि:-  सोचता हूँ होता संग तेरे, बस तोड़ ये डंडीर न सका,           प्रेम भरा था हृदय में मेरे भी,    मैं हनुमान न बन सका, सीना चीर न सका।                                                14.05.2025