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राम

राम राम राम जय श्री राम अंश राम, अंग राम, अम्ब राम, अंतरंग राम, कीर्ति राम, अकीर्ति राम, गम राम, अगम राम, अधिक राम , जगत में हरेक कम  राम। अबोध राम, अभ्यम राम, अभद्र राम, सभ्यम राम।
मेरे राम, मेरी रमायण, मेरी गाथा में न  कोई मंथरा है न कैकई है, कोई विभीषण नहीं  और न कोई रावण है। सब लक्ष्मण, भरत जैसे हैं, सब सुग्रीव, हनुमान से हैं।

इश्क का उत्सव

      इस तरह चलो ये माह चलाएं,      इश्क़ का उत्सव मनायें, प्रेम की डोर में कुछ वासव लायें।             तुम चंदा कहो,            मैं चाँद कहूँ तुम्हें,           तुम छबीला कहो,            मैं बांद कहूँ तुम्हें, तुम कहो मुझे सबेरा,    मैं साँझ कहूँ तुम्हें,          सुमन तुम संगीत कहो,         मैं नाँद-निनाद कहूँ तुम्हें। तुम चंदा कहो,            मैं चाँद कहूँ तुम्हें
अमृता आती रही जाती रही यहाँ बहुत, मुझे बताओ कौन फिर से इमरोज हुआ, शायरों की दुनिया में साहिर हुए बहुत पर, मुझे बताओ कौन प्रीतम हर रोज हुआ।

रीस

कबै निस्पात ए जां, त चोकरैण ए जां कबै, नॉर्मली शांत चित्त भ्यूं, पर देर-सबेर रीस ले ए जां कबै। काम खूब मन लगैक करणु, पर आदिमय त भ्यूं, पैनी ले जां कबै। आराम पसन्द आदिम भ्यूं, भरी नींद मे, अद्धि रात मे, कोई फोन जे करौ,  खुंचुरैण ए जां कबै, कबै निस्पात ए जां, त चोकरैण ए जां कबै।।
मेरा देश, देश नहीं मुकुट है धरा का, ये चोटी, चोटी नहीं  लकुट है अजा का, आओ कभी तो साल-दो साल ठहर भी जाओ, दो-चार पल का तो अंधेरा भी सुकून देता है। ये जो पहाड़ हैं पहाड़ नहीं है दरअसल, ये हौंसले हैं हिमाल के रहवासियों के, देखो! पहाड़ से हौसलें  हैं जहाँ, मेरा गाँव हैं वहाँ,  मेरा गाँव हैं वहाँ।।

बासी भात

गर्त में कितना कुछ दफन है,  दुपहरी के समय ऑफिस पास में होने के कारण भोजन बनाने का जिम्मा मेरे पास था, घर पहुंचा तो दाल पहले से सुमन बना गई थी, मुझे केवल भात बनाना था। कुछ दिनों पहले ही डेढ़ साल बाद सुमन ने अपनी ड्यूटी जॉइन कर ली तो, काफी समय बाद किचन में प्रवेश किया।  भात बनाने को बर्तन देखे तो 3 प्रकार के चावल रखे थे, एक पतले लंबे दाने वाला बासमती, एक दूसरा मोटे दाने वाला चावल और एक घर का लाल चावल। इन्हीं को देखकर याद आया अभावों का दौर जब 5 भाई-बहनों वाले घर में बासी भात के लिए संघर्ष चलता था। हालांकि सबसे बड़ी दीदी थी उसका विवाह हो चुका था जब तक मैं इस दौर को लिख रहा हूँ उसमें 3 ही मुख्य किरदार थे दीदी के बाद दूसरे नम्बर के बड़े भाई हैं वो अब सबसे बड़े थे और समझदार भी तो वो इसमें नहीं कूदते थे। बाकि बचे हम तीन दीदी, छोटे दाज्यू और मैं, हमारे बीच चलता था एक युद्ध जिसे नाम दिया है बासी भात। पिताजी दिन भर काम के लिए बाहर रहते थे और ईजा घर के कामों में उलझी हुई। खाने को कोई कमी तो राशन की नहीं थी पर कई बार ऐसा होता था कि घराट नहीं जा पाने के कारण सुबह रोटी बनाने के लिए मंडुवा, जौ या...