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ईजा कहाँ से लाऊंगा

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थक सा गया हूँ साहब कितना चलूंगा..? सामर्थ्य खत्म हुआ अब, मैं अजा कहाँ से लाऊंगा..? थक-हार मां की गोदी में सिर रख देते होंगे न तुम साहब, गोद किराए की मिले भी अब, मैं ईजा कहाँ से लाऊंगा..? लम्बा सफर है जीवन का ज्योतिष कह गया था मुझे, अगर चाहूं तो भी कजा कहाँ से लाऊंगा..? सब हैं साहब यहाँ, पर मैं ईजा कहाँ से लाऊंगा...?

एक कमीज वाला-2

आज फिर देखा मैंने वो लड़का ............................. हाँ.......!   वही "एक कमीज वाला"...      उसका बचपन बड़ा अजीब था..."ना कागज की कश्ती थी ना बारिश का पानी, था तो एक अभाव में पनपा शरीर और एक अनसुलझा धागा इस दौर-ए-ज़...

"बैशाखी पौधा"

....      भादो मास के थपेड़ों को सहकर भी उसने हिम्मत की थी एक बीज को बो कर उसे परवरिश देने की,, अपनी बंजर हो चुकी ज़मीन पर दस साल बाद ये बीज कहीं बोया ,,, मालूम उसे भी नहीं था कि ज़मीन फिर से ...

"बचपन का शौक"

        कई दफ़ा सोचा कि मैं भी इस गोल-गोल से घूमने वाले चरखे में बैठूँ.......वो वक़्त जो था वो बचपन था , ज़िस्म के बाजू में छुपा छुटमुट सा बचपना भी कहीं समेट रखा था,,,        मेलों में जाकर ब...

बरी

महज़ दो गज चले थे कि , उन्हें भारी सा लगने लगा, कुछ अतीत ने बांधा उन्हें, कुछ समय ने प्रभाव में लिया, उनके शब्द उनकी हुकूमत, उनकी ही किलेबंदी है, कोई जाकर बतला दो कि, आज़ाद थे वो आज़ाद ...

शौक

एक टुकड़ा लकड़ी उठाकर,           एक कश्ती बनाने निकले थे हम, एक छोर नदी का पकड़कर,           अतीते-गम डुबाने निकले थे हम, टांका जोड़ा, कील लगाई, मुश्किल से कश्ती बनाई,              डू...

भिखारी ठहरे हम...

जी रहे हैं बड़ी मृदुलता से,             भीख से मिला जीवन, निर्मित पूर्ण कोमलता से,             दारिद्र अपना मन..! अपनापन देख पाती नहीं,                 हुई नज़रे अंधकारी, कहाँ सम्भ...