अमृता आती रही जाती रही यहाँ बहुत, मुझे बताओ कौन फिर से इमरोज हुआ, शायरों की दुनिया में साहिर हुए बहुत पर, मुझे बताओ कौन प्रीतम हर रोज हुआ।
Posts
बासी भात
- Get link
- X
- Other Apps
गर्त में कितना कुछ दफन है, दुपहरी के समय ऑफिस पास में होने के कारण भोजन बनाने का जिम्मा मेरे पास था, घर पहुंचा तो दाल पहले से सुमन बना गई थी, मुझे केवल भात बनाना था। कुछ दिनों पहले ही डेढ़ साल बाद सुमन ने अपनी ड्यूटी जॉइन कर ली तो, काफी समय बाद किचन में प्रवेश किया। भात बनाने को बर्तन देखे तो 3 प्रकार के चावल रखे थे, एक पतले लंबे दाने वाला बासमती, एक दूसरा मोटे दाने वाला चावल और एक घर का लाल चावल। इन्हीं को देखकर याद आया अभावों का दौर जब 5 भाई-बहनों वाले घर में बासी भात के लिए संघर्ष चलता था। हालांकि सबसे बड़ी दीदी थी उसका विवाह हो चुका था जब तक मैं इस दौर को लिख रहा हूँ उसमें 3 ही मुख्य किरदार थे दीदी के बाद दूसरे नम्बर के बड़े भाई हैं वो अब सबसे बड़े थे और समझदार भी तो वो इसमें नहीं कूदते थे। बाकि बचे हम तीन दीदी, छोटे दाज्यू और मैं, हमारे बीच चलता था एक युद्ध जिसे नाम दिया है बासी भात। पिताजी दिन भर काम के लिए बाहर रहते थे और ईजा घर के कामों में उलझी हुई। खाने को कोई कमी तो राशन की नहीं थी पर कई बार ऐसा होता था कि घराट नहीं जा पाने के कारण सुबह रोटी बनाने के लिए मंडुवा, जौ या...
शहर में भी गाँव रहते हैं
- Get link
- X
- Other Apps
शहर में भी गाँव होते है, बेशक नहीं होती यहाँ निर्मल नदियां, नहीं होते झरने, नहीं होते खेत, नहीं होती किसी से बेमतलब की भेंट, पर हाँ! शहर में भी गाँव होते हैं, नाम गाँव सा मुहल्ले का रखकर, लोग अपने गाँव को जिंदा रखते हैं, यादें रहती है गाँवों की इन शहरी बस्तियों में, पेड़ रहते हैं, गाँव के स्थान नाम रहते है, बस गाँव नहीं रहता शहर में, शहर में गाँव की भावनाएं रहती है, बसने की मजबूरियां रहती हैं, गाँव तो नहीं होता कोई शहर पर, शहर में भी गाँव बसते हैं।
आग, तेल और लूण
- Get link
- X
- Other Apps
कई बार बचपन को याद करके बड़ा अनूठा और डर या फिर यूँ कहूँ शर्मिंदगी से भरा दौर भी याद आ जाता है। पहाड़ों में साधन की कमी तो सदियों से चली आ रही दास्तान है, इसी में एक दौर जिसे उकेर पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल वो दौर था। बात शुरू करता हूँ मैं 91 में पैदा हुआ यानि ऐसे परिवर्तन वाले दौर में जहाँ दुनिया वैश्वीकरण की ओर थी और हम बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते थे। स्थिति बताने के लिए शायद इतना काफी होगा कि मैं 7वीं में पढ़ता था तब खाकी स्कूल ड्रेस की एकमात्र पेंट थी मेरे पास और अंडरवीयर की तो बात ही क्या करनी। एकमात्र पैंट वही घर में और वही स्कूल में पहनने को मजबूर अक्सर गन्दी हो जाने पर शाम के समय धोता था और अन्य एक पजामा जैसा था भी तो पिछवाड़े में दो बड़े चश्में जैसे टाँके लगे हुए थे जिसे पहनने में शर्मिंदगी अलग थी। ये तो छोड़िए मात्र ₹ 2 उस दौर में स्कूल फीस होती थी वो भी हमेशा लेट हो जाती थी अब हँसी भी आती सोचकर और ये सोचकर थोड़ा सहम सा भी जाता हूँ कि पिताजी भाई ये लोगों के लिए कितना मुश्किल दौर रहा होगा वो। खैर उस और न जाते हुए टॉपिक में आता हूँ। इस दौर में बिजली थी नहीं एक-दो ल...